Tuesday, May 15, 2018

जब आंख खुली तो अम्मा की

जब आंख खुली तो अम्मा की 

गोदी का एक सहारा था 

उसका नन्हा सा अंचल मुझको 
भूमंडल से प्यारा था 


उसके चेहरे की झलक देख 
चेहरा फूलों सा खिलता था 
उसके स्तन की एक बूंद से 
मुझको जीवन मिलता था
हांथो से बालों को नोचा 
पैरों से खूब प्रहार किया 
फिर भी उस माँ ने पुचकारा 
हमको जी भर के प्यार किया 

मैं उसका राजा बेटा था 
वो आंख का तारा कहती थी 
मैं बुढ़ापे में उसका 
बस एक सहारा कहती थी 

ऊँगली पकड़ चलाया था 
पढने विद्यालय भेजा था 
मेरी नादानी को भी निज 
अंतर में सदा सहेजा था 

मेरे सारे प्रश्नों का वो 
फ़ौरन जवाब बन जाती थी 
मेरी राहों के कांटे चुन 
वो खुद गुलाब बन जाती थी 



मै बड़ा हुआ तो कॉलेज से 
एक रोग प्यार प्यार ले आया 
जिस दिल में माँ की मूरत थी 
वो रामकली को दे आया 




शादी की पति से बाप बना 
अपने रिश्तों में झूल गया 
अब करवाचौथ मनाता हूँ 
माँ की ममता ममता को भूल गया 



हम भूल गए उसकी ममता 
मेरे जीवन की थाती थी 
हम भूल गए अपना जीवन 

वो अमृत वाली छाती थी 

हम भूल गए वो खुद भूखी 
रह करके हमें खिलाती थी 
हमको सूखा बिस्तर देती थी 
खुद गीले में सो जाती थी 

हम भूल गए उसने ही 
होंठो को भाषा सिखलायी थी 
मेरी नींदों के लिए रात भर 
उसने लोरी गाई थी 

हम भूल गये हर गलती पर 
उसने डाटा समझाया था 
ताकि बचूं बुरी नजर से 
काला टीका सदा लगाया था



हम बड़े हुए तो ममता वाले 
सारे बंधन तोड़ आये 
बंगले में कुत्ते पाल लिए 
माँ को वर्द्धाआश्रम में छोड़ आये 

उसके सपनो का महल गिरा कर 
कंकर-कंकर बिन लिए 
खुदगर्जी में उसके सुहाग के 
आभूषण तक छीन लिए 

हम माँ को घर के बटवारे की 
अभिलाषा तक ले आये 
उसको पावन मंदिर से 
गली की भाषा तक ले आये 

माँ की ममता को देख मौत भी 
आगे से हट जाती है 
अगर माँ अपमानित होती है 
धरती की छाती फट जाती है 

घर को पूरा जीवन देकर 
बेचारी माँ क्या पाती है 
रुखा सुखा खा लेती लेती है 
पानी पि कर सो जाती है 

जो माँ जैसी देवी घर के 
मंदिर में नहीं रख सकते है 
वो लाखों पुण्य भले कर लें 
इन्सान नहीं बन सकते है 

माँ जिसको भी जल दे दे 
वो पौधा संदल बन जाता है 
माँ के चरणों को छु कर पानी 
भी गंगाजल बन जाता है 

माँ के आंचल ने युगों-युगों से 
भगवानो को पाला है 
माँ के चरणों में जन्नत है 
गिरिजाघर और शिवाला है 



हर घर में माँ की पूजा हो 
एसा संकल्प उठाता हूँ 
मई दुनिया की हर माँ के 
चरणों में शीश झुकाता हूँ.
                                                                        Shyamesh kushwaha 

Thursday, May 10, 2018

उम्र में चाहे कोई

उम्र में चाहे कोई बड़ा हो या छोटा हो,लेकिन
वास्तव में बड़ा तो वही है,जिसके दिल में सबके लिए प्रेम,
      स्नेह और सम्मान की भावना हो.                              
                                                                                                       श्यामेश कुशवाहा

एक इन्सान कि सब कुछ

    एक इन्सान कि सब कुछ
    कापी कर सकता है,
 पर किसी का भाग्य और
     नसीब नहीं ...!!

एक उम्र गुस्ताखियों के लिए


                                   ''एक उम्र गुस्ताखियों के लिए भी होनी चाहिए
                                ये कमबख्त जिन्दगी तो बस अदब और लिहाज में ही गुजर गई ''
                                  ''इत्तफाक से तो नहीं टकराये हम तुम ऐ दोस्त
                                       कुछ ख्वाहिश तो खुदा की भी होगी''
                                                                                                               श्यामेश कुशवाहा